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” थैलेसीमिया से बचने के लिए शादी से पहले लड़के व लड़की की मिलानी चाहिए स्वास्थ्य कुंडली”…

डीएमसी ऑडिटोरियम में दो दिवसीय बैपकॉन- 2020 सम्मेलन शुरू
• देश भर के जाने- माने पैथोलॉजिस्ट व माइक्रोबायोलॉजिस्ट ने दिया व्याख्यान
• डीएमसी ऑडिटोरियम में शुरू हुआ बैपकॉन- 2020…

दरभंगा: दरभंगा मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में शनिवार को बैपकॉन- 2020 की शुरूआत की गयी. इसमें देश के जाने माने- दर्जनों पैथोलॉजिस्ट व माइक्रोबायोलॉजिस्ट ने एक मंच पर उपस्थित होकर अपने- अपने विषयों पर व्याख्यान दिया.
नार्थ मेडिकल कॉलेज से आये डॉ विद्युत गोस्वामी ने थैलेसीमिया रोग के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा भारत में अक्सर शादी करने से पहले लड़के और लड़की की कुंडली मिलाई जाती है, कुंडली मिलने पर शादी कर दी जाती है. थैलेसीमिया से बचने के लिए शादी से पहले लड़के और लड़की की स्वास्थ्य कुंडली मिलानी चाहिए, जिससे पता चल सके की उनका स्वास्थ्य एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं. स्वास्थ्य कुंडली में थैलेसीमिया, एड्स, हेपेटाइटिस बी और सी, आरएच फैक्टर इत्यादि की जांच कराना चाहिए. आज विज्ञान इतना आगे बढ़ चूका है. जागरूक रहकर हम थैलेसीमिया जैसे कई खतरनाक बिमारियों से खुद को बचा सकते हैं. इसमें जरा सी लापरवाही बरतने पर पुरे जिंदगी को बर्बाद कर सकती है.
हर साल थैलेसीमिया के 10 हजार बच्चे लेते हैं जन्म:
थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रक्त रोग है, जो माता अथवा पिता या दोनों के जींस में गड़बड़ी के कारण होता है. रक्त में हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है. पहला अल्फा व दूसरा बीटा ग्लोबिन. इन दोनों में से किसी प्रोटीन के निर्माण वाले जीन्स में गड़बड़ी होने पर थैलेसीमिया होता है. संबंधित मरीजों के रक्त एवं हिमोगलोबिन निर्माण के कार्य में गड़बड़ी होने के कारण बार- बार रक्त चढ़ाना पड़ता हैं. भारत में हर वर्ष सात से 10 हजार बच्चे थैलेसीमिया से पीड़ित पैदा होते हैं. यह रोग न केवल रोगी के लिए कष्टदायक होता है बल्कि सम्पूर्ण परिवार के लोगों के लिये भी समस्या का कारण बन जाता है.
थैलेसीमिया का उपचार:
थैलेसीमिया का उपचार करने के लिए नियमित रक्त चढाने की आवश्यकता होती है. कुछ रोगियों को हर 10 से 15 दिन में रक्त चढ़ाना पड़ता है. ज्यादातर मरीज इसका खर्चा नहीं उठा पाते है. सामान्यतः पीड़ित बच्चे की मृत्यु 12 से 15 वर्ष की आयु में हो जाती हैं. सही उपचार लेने पर 25 वर्ष से ज्यादा समय तक जीवित रह सकते हैं. थैलेसीमिया से पीड़ित रोगियों में आयु के साथ- साथ रक्त की आवश्यकता भी बढ़ते रहती हैं.
खेलासोन थेरेपी
बार-बार रक्त चढाने से और लौह तत्व की गोली लेने से रोगी के रक्त में लौह तत्व की मात्रा अधिक हो जाती है. लीवर, स्पीलिन, तथा ह्रदय में जरुरत से ज्यादा लौह तत्व जमा होने से ये अंग सामान्य कार्य करना छोड़ देते हैं. रक्त में जमे इस अधिक लौह तत्व को निकालने के प्रक्रिया के लिए इंजेक्शन और दवा दोनों तरह के ईलाज उपलब्ध है. इसके अलावा बोन मेरो ट्रांसप्लांट और स्टेम सेल का उपयोग कर बच्चों में इस रोग को रोकने पर शोध हो रहा हैं. इनका उपयोग कर बच्चों में इस रोग को रोक जा सकता है.
दीप जलाकर कार्यक्रम का किया उद्घाटन:
डीएमसी ऑडिटोरियम में दो दिवसीय बैपकॉन सम्मेलन की शुरूआत शुक्रवार से हुई. बतौर मुख्य अतिथि डॉ जगदेव शर्मा, डॉ केएम दुबे व डॉ अर्जुन प्रसाद व अन्य अतिथियों ने कार्यक्रम का उदघाटन दीप जलाकर किया. इसके पूर्व आगत अतिथियों का स्वागत पारंपरिक तरीके से किया गया. मौके पर डॉ शर्मा ने कहा कि इस तरह के आयोजन से मरीजों व जुनियर चिकित्सकों को फायदा मिलता है. सम्मेलन के आयोजन से देश भर में आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था से लोग रू-बरू होते हैं. इसके अलावा डॉ कुमार शौरभ, डॉ श्रीकांत भारती, डॉ विद्युत गोस्वामी, डॉ कौशल के प्रसाद, डॉ परमल अग्रवाल, डॉ पुनम बदानी, डॉ उमा नाहर, डॉ अनिता तलेहान व डॉ बिपिन कुमार, डॉ अजित कुमार चौधरी चिकित्सकों ने सांइटिफिक शेसन में अपने विषयों पर व्याख्यान प्रसतुत किया.
मौके पर अधीक्षक डॉ आरआर प्रसाद, डॉ रंजन कुमार राजन, डॉ सुदय कुमार सिंह, डॉ आर एस प्रसाद, डॉ बीएन ठाकुर आदि मौजूद थे.

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