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कोरोना काल में कफन बनाने के कार्यों में हुआ डबल इजाफा… बिहार, झारखंड, उड़ीसा सहित बंगाल तक होता है निर्यात…

गया: कोरोना महामारी ने पूरे विश्व में कोहराम मचा रखा है। भारत देश में भी कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। वही कोरोना से मरने वाले लोगों की संख्या में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसे लेकर गया जिले के मानपुर प्रखंड के पटवा टोली मोहल्ले में बड़े पैमाने पर कफन व पितांबरी का निर्माण हो रहा है। कफन बनाने के लिए 15 से 20 परिवार लगातार लगे हुए हैं। लोगों का कहना है पूर्व में मांग बहुत कम थी। लेकिन अब कोरोना के कारण मौतों के आंकड़ों में हुई वृद्धि को लेकर यह मांग दुगनी हो गई है। पूरे परिवार के साथ दिन-रात कफन बनाने में लगे हुए हैं।

गौरतलब है कि मानपुर का पटवाटोली बिहार का मैनचेस्टर उद्योग के रूप में विख्यात है। मानपुर के पटवाटोली में 10 हजार से भी ज्यादा पावर लूम मशीने लगी हुई हैं। जो मुख्य रूप से चादर व गमछा बनाने का कार्य करती हैं। इनके बनाए गए गमछा और चादर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा सहित देश के कई राज्यों में निर्यात होते हैं। लेकिन अब पावरलूम बंद पड़ गया है। कोरोना के कारण ना तो व्यापारी यहां चादर गमछा खरीदने आ रहे हैं और ना ही यहां निर्माण हो पा रहा है। यहां की अधिकतर मशीनें बंद है और पूरा मोहल्ला सुनसान पड़ा हुआ है। लेकिन इसी पटवाटोली के 15 से 20 घर ऐसे हैं जहां की पावर लूम की मशीन चालू है। इन मशीनों पर चादर, गमछा के बजाय अब कफन बनाया जा रहा है।
कफन बनाने वाले पटवा टोला मुहल्ला निवासी चंदन प्रसाद पटवा कहते हैं कि कोरोना के कारण गमछा व चादर बनाने का काम बंद पड़ गया। मांग भी नहीं थी। ऐसे में जीवकोपार्जन की समस्या उत्पन्न हो गई थी। लेकिन विगत कई महीनों से कफन की मांग बढ़ गई है। ऐसे में हमारा पूरा परिवार कफन बनाने में दिन-रात लगा हुआ है। लगातार हम लोग 15 घंटे तक मेहनत कर रहे हैं। व्यापारियों के द्वारा बड़े पैमाने पर कफन की मांग की जा रही है। ऐसे में हमलोग का पूरा परिवार कफन बनाने में लगा हुआ हैं। कफन बनाने से मिले पैसों से हमारे घर की जीवका का चल रही है। उन्होंने बताया कि पहले तो 15 से 20 हजार पीस कफन हमलोग बनाते थे। लेकिन अब 40 से 50 हजार पीस बना रहे हैं। लगातार कफन की डिमांड बढ़ती जा रही है। उन्होंने बताया कि हमलोग छोटे व्यवसाई हैं इसलिए अपने हाथों से कफन बनाते हैं। जबकि बड़े व्यवसाई पावरलूम का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके द्वारा बड़े पैमाने पर कफन बनाने का कार्य किया जा रहा हौ।
वहीं स्थानीय निवासी द्वारिका प्रसाद पटवा बताते हैं कि कभी इस क्षेत्र में गमछा व चादर बनाने के लिए पावर लूम की मशीनें चलती थी। पटवा मोहल्ले को आईआईटीएन का गांव के रूप में भी लोग जाने जाते थे। लेकिन कोरोना के कारण परीक्षाएं बंद है। गमछा चादर बनाने का काम भी ना के बराबर है।
लेकिन आसपास के राज्यों एवं बिहार के कई जिलों से कफ़न बनाने की मांग बढ़ती जा रही है। इसे लेकर पटवा मोहल्ले के 15 से 20 परिवार कफन बनाने का कार्य दिन-रात कर रहे हैं। कफन पर रामनामा लिखा जाता है। बंगाल भेजने वाले कफन पर बंगाली भाषा में रामनामा लिखते हैं और इसके बाद उसे भेज देते हैं…

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